Thursday, 13 February 2020

राईका/रबारी/देवासी समाज का पूरा इतिहास और गोत्र ?


राईका/रबारी/देवासी समाज का पूरा इतिहास और गोत्र ?  



दोस्तों में गौतम राईका में आज इस आर्टिकल के माध्यम से आपको बताऊंगा की राईका/रबारी/देवासी  समाज का इतिहास दोस्तों यह एक चरवाह जाती है जो राईका, देवासी, देसाई,रबारी, गडरिया, गाडरी,गोपालक, मलधारी,पाल,हिरावंसी, निम्न नामों से जानी जाती है, यह जाती चरवाह होने के नाते हमेशा ही प्रकृति के निकट रही है इसलिय इस जाती के लोग सदा ही सरल प्रेमालूऔर दयावान रहे है, 
इन्ही देव्गुनो की बदोलत पोराणिक लोग इनमे देवताओ का वास  मानते थे इसलिए इन्हें देव वासी का संबोधन प्राप्त हुआ जो आगे चल कर देव वासी हो गया, दूसरा शब्द है रेबारी जिसका मूल शब्द हे रेवाड़ी अर्थार्त यह शब्द उतरा है रेवड़ से जिसका अर्थ है ढोर या पशुओ क झुण्ड और उन ढोरो के पलक को रेवाड़ी खा जाने लगा जो बाद में रेबारी हो गया,


कुछ विद्वानों का मनना हे की शुरूआती आर्यों लगभग एक ही जाती के थे जिनका मुख्य काम था पशुपालन और खेती बाड़ी, धीरे धीरे उनमे से कई जातियो का उद्भव हुआ सभ्य मनुष्यों का व्यवसाय था पशुपालन और खेती बाड़ी अथार्त इन जातियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी पशुपालन के व्यवसाय को अपनाया रखा वो जाती सबसे पोराणिक जाती के जिन्दा रखा रखा है,  देवासी अर्थार्त रबारी जाती न बल्कि राजस्थान लेकिन पुरे भारत में फैली हुई है विशेष कर उत्तर पश्चिम भारत और मध्ये भारत में यह जाती राजस्थान के अतिरिक्त गुजरात, मध्येप्रदेश, उतरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, में भी निवास करती है एक अनुमान के मुताबिक पाकिस्तान में भी लगभग 10000 रेबारी आज भी निवास करते है, यह जाती शुरू से ही पशुपालन से जुडी होने के नाते घुम्मकड़ जीवन निर्वाह करती रही शायद ये ही कारन हे की इनका कोई लिखित पर्मानिक इतिहास नहीं है , किन्तु दन्त कथाओं कुछ भाट-वाहियों की माने तो इस जाती का इतिहास सामने आया है,

देवासी जाती की उत्पति 

राईका/रबारी/देवासी समाज का पूरा इतिहास और गोत्र ?
शिव 

माना जाता है की इस जाती की उत्पति कुछ इस प्रकार हुई की एक बार माता पार्वती ने सरोवर की गीली मिटटी से एक ऊंट की आकृति बनायीं और भोले नाथ शिव से प्रार्थना की की आप इसे संजिवत कर दो तो भगवन शिव ने उस आकृति की संजिवत   दिया और पहली बार ऊंट प्रजाति का जन्म हुआ माँ पार्वती ने अपने प्रिये ऊंट की देखरेख की लिए चरवाह प्रकट करने को कहा तो भोले नाथ ने सामने खड़े शामल नमक पढ़ की छाल से एक मनुष्य प्रकट किया जिसने उस ऊंट अर्थार्त सांड की खूब सेवा की आगे चलाकर उन की पीढियों ने ऊंट को पलना जारी रखा जिसकी बदोलत बदोलत देवासियो में एक गोत्र पाई जाती है इन्हें सामड कहा जाता है ,

राईका/रबारी/देवासी समाज का पूरा इतिहास और गोत्र ?

कहा जाता है की वह व्यक्ति शिव पार्वती का भक्त था इसलिए शिवजी ने उसे ऊँटो का एक झुण्ड देकर भूलोक को विदा किया आगे चलकर उसको चार बेटियां हुई शिवजी ने उनके ब्याह राजपूत जाती के पुरुषो के साथ की और उनकी जो संतति हुई वो हिमालय के नियम के बाहर हुई थी इसलिए वो राह्बरी/ रेबारी के नाम से जाना जाता है भट-चारण और वाही वन्साओ के ग्रंथो के आधार पर मूल पुरुष को सोलह लडकियां हुईं और उन सोलह लड़कियों का ब्याह सोलेह क्षत्रिये पुरुषों के साथ हुआ जो हिमालय के नियम के बाहर था इसलिए उन्हें रहबरी / रेबारी के नाम से जाना जाता है जिनकी शाख राठोड, परमार, सोलंकी, मख्वाणा, आदि राखी गयी  ज्यो ज्यों वंश आगे बढ़ा रबारी जाती अनेक शाखाओं में बाँट गयी वर्तमान में इनकी 133 गोत्र या शाखा उभर क्र सामने आई,
जिसे विशोतर के नाम से भी जाना जाता है अर्थार्त (20+100+13=133), के नाम से पहचानी गयी , लेकिन वि राजपूतो में से रायपुत्र के नाम से व् रायपुत्र का अपभ्रंश होने से रायका के नाम से व् गायो का पालन करने से गोपालक , महाभारत के  के समय में पांड्वो का महत्वपूर्ण काम करने से देसाई के नाम से भी जानी जाती है, एक मान्यता के अनुसार मक्का मदीना के इलको में मोहमद पैगम्बर साहब से पहले जो अराजकता फैली जिसके कारण मूर्ति पूजा का खूब विरोध चला परिणाम सवरूप इस जाती ने अपना धर्म बचाने के लिए अपने देवी-देवताओ को पालकी में लेकर हिमालय के रस्ते से भारत में प्रवेश किया, इसलिए अभी भी कई राबरी जाती के लोग अपने देवी-देवताओ की की मूर्ति स्थापित नही करते हे,वह उन्हें पालकी में ही पूजा करते है,
इस जाती में शिक्षा में आभाव बहत्त कम था लेकिन अब धीरे धीरे विकास की राह पर अग्रसर हे, इस जाती के के लोग अब शिक्षा में अग्रसित होने के साथ साथ राजनीती की बात करे तो करे तो ये जाती भाग्येशाली है ,

अब अंत में देवासी समाज से मेरी(गौतम राईका) गुजारिश है की आप भले ही विकास के लम्बे डग भरे भले ही आप भविष्य के सिरमोर बने लेकिन आप अपना मूल स्वभाव अपने मूल गुण संस्कृति और जिन्दा दिल जीवन शेल से दूर न होना वर्ना दवासी कोम तो रहेगी परन्तु देव वाषिक हो जायेंगे ,
राईका/रबारी/देवासी समाज का पूरा इतिहास और गोत्र ?

देवासी जाती की प्रमुख गोत्र :-

        1 आल  2 आग 3 आमला 4 आजाणा 5 ऐन्द्दु, आँडू,ऐन्दा, 6 उमोट 7 उलवा 8 बारड 9 बार 10 बालस

11 बोसतर 12 बुरसला 13 बागड़ 14 भरू 15 भरडोम 16 भाड़का 17 भीम 18 भराई 19 भूकिया 20 भुन्गरू

21 भुम्भलिया 22 भुकु २३ भांगरा 24 चावड़ा 25 चन्दुआ 26 चेलाणा 27 चोहान 28 चोपड़ा 29 दत 30 देऊ

 31 डेडिया 32 डेडर डोडर ३३ दगल 34 ढालोप 35 धान्दुआ 36 धारुआ 37 धंगु 38 गांगल 39 गोहित 40 घाटिया

 41 घेघवा 42 गलसर 43 गहलोत ४४ गह्ल्तर 45 गुजर 46 गेहड  47 हेरबी 48 हरावल 49 हुण 50 हुलीच

 51 हरण 52 जोटाणा 53 जाधव 54 झुआँ 55 झांगर 56 जंज (झंद्द) 57 जाडेजा 58 जोधा 59 झाला 60 जाहेर

61 जाम्बड 62 करमता 63 करगता 64 खरड 65कासेला 66कालर 67 लोतरा 68 खाम्बला 69 कटारिया 70 खेर

71 कोदियातर 72 कोला 73 करोड़ 74 खेखा 75 कुंकड 76 कच्छवाह 77 कलवा 78 कासद 79 खटाणा 80 लव्तुंग

81 लोडा 82 लूणी 83 लुल्तारा 84 मकवाणा 85 मोटन 86 मोरदाव 87 मरिया 88 मेह 89 मरोड़ 90 नांगु

91 नार 92 परमार 93 परिहार 94 पेवाला 95 पनकारा 96 पुन्शला 97 पारिवाल, पाल 98 पराट 99 पवेसा 100 फलदुंडा

101 पन्ना 102 रोज 103 राठोड 104 राडा 105 रागुआ 106 रागिया 107 रोंटी 108 सेप्डा 109 साम्बड 110 सव्धरिया, सबदरा

111 शेखा 112 सिंगल 113 सरधना 114 सावलाना 115 सुकल 116 सिसोदिया 117 सोढा 118 तलतोड़ 119 तवोना 120 वेराना

121 विरोड 122 वीसा 123 वनुआ 124 वाघेला 125 वतमा 126 रंजा 127 धुला 128 मोट 129 धम्बड 130 दहिया

131 सेवाल 132 तमालिया 133  मोरी, डाभी, मोड्या, सव्तानी, पिसवाला, अलावत, रामपा, सेंगावत, भासवत, लुन्का

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दोस्तों कोई लेखन में कही इधर उधर हो तो क्षमा करे वैसे लिखने में बहुत सावधानी बरती फिर भी कही गलती हो तो क्षमा करे
नीचे कमेन्ट करे आप कहा से हो और आपकी गोत्र क्या है .----------------------------------------

धन्येवाद देवासी/रेबारी भाईओं फोलो करना न भूले

3 comments:

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